राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग का खेल — BJP की सत्ता राजनीति का काला अध्याय
2016 की “स्याही कांड” से लेकर 2022 में अजय माकन की हार, और अब 2026 में सतीश नांदल को उतारने तक — कैसे BJP ने हरियाणा में राज्यसभा चुनावों को बार-बार हेराफेरी का अखाड़ा बनाया
2016 “स्याही कांड”
2022 हरियाणा चुनाव
16 मार्च, हरियाणा
प्रस्तावना: लोकतंत्र का खोखला उपहास
राज्यसभा — जिसे संविधान निर्माताओं ने “Council of States” के रूप में परिकल्पित किया था — भारत के संघीय ढांचे की रीढ़ है। जहाँ लोकसभा के सदस्य सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं, वहीं राज्यसभा के सदस्य राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित विधायकों द्वारा चुने जाते हैं। यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई थी ताकि अनुभवी और विद्वान व्यक्ति बिना सीधे चुनाव लड़े भी संसद में पहुँच सकें और राज्यों के हितों की रक्षा हो सके।
लेकिन आज राज्यसभा चुनाव हॉर्स-ट्रेडिंग, मनी पावर और संगठित दलबदल का अखाड़ा बन चुके हैं — खासतौर पर उन राज्यों में जहाँ भारतीय जनता पार्टी (BJP) सत्ता में है। हरियाणा राज्यसभा चुनावों में क्रॉस वोटिंग का बार-बार दोहराया जाने वाला खेल इस बात का सबूत है कि कैसे चुनावी लोकतंत्र को अंदर से खोखला किया जा सकता है — न गोलियों से, बल्कि नीली स्याही, गायब वोटों और खरीदे हुए विधायकों से।
“जिब संख्या बल नहीं हो, फेर भी सीट जीत ली — इसनै लोकतंत्र कहवैं या मक्कारी?”
— अधि. रविन्द्र सिंह ढुल, जुलाना
संवैधानिक पृष्ठभूमि: क्रॉस वोटिंग की कानूनी खामी
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 80 के अनुसार, राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति (Proportional Representation by Single Transferable Vote) से होता है। 2003 में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 59 में संशोधन करके ओपन बैलट (खुली मतपत्र) व्यवस्था लागू की गई, जिसमें किसी राजनीतिक दल के विधायक को अपना मतपत्र दल के अधिकृत प्रतिनिधि को दिखाना अनिवार्य है।
लेकिन यहाँ सबसे बड़ी खामी है — संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) राज्यसभा चुनावों पर लागू नहीं होती।
उच्चतम न्यायालय ने कुलदीप नायर बनाम भारत संघ (2006) 7 SCC 1 में स्पष्ट किया कि राज्यसभा चुनाव में अपने दल के विरुद्ध मतदान करने वाला विधायक दल-बदल विरोधी कानून के अंतर्गत अयोग्य नहीं होगा।
— उच्चतम न्यायालय
अर्थात् — कोई भी विधायक राज्यसभा चुनाव में खुलेआम अपनी पार्टी के खिलाफ वोट कर सकता है और उसकी विधानसभा सदस्यता पर कोई आँच नहीं आएगी। यही वो कानूनी अंधा-बिंदु है जिसका BJP ने हरियाणा में बार-बार शोषण किया है।
🖋️ केस स्टडी I: 2016 हरियाणा राज्यसभा चुनाव — “स्याही कांड”
दलीय गणित: जून 2016 में हरियाणा की दो राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव हुए। 90 सदस्यीय विधानसभा में BJP के 47, INLD के 19, और कांग्रेस के 17 विधायक (कुलदीप बिश्नोई की HJC के विलय सहित) थे। केन्द्रीय मंत्री बीरेन्द्र सिंह BJP के उम्मीदवार थे और उनकी जीत तय थी। दूसरी सीट के लिए INLD और कांग्रेस ने संयुक्त रूप से सुप्रीम कोर्ट के प्रतिष्ठित अधिवक्ता आर.के. आनंद को समर्थन दिया था — दोनों दलों के पास मिलकर 35+ वोट थे।
BJP ने अपने “अतिरिक्त” वोटों का उपयोग करने के लिए ज़ी ग्रुप के चेयरमैन और मीडिया बैरन सुभाष चन्द्रा को ‘निर्दलीय’ उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतारा।
चौंकाने वाला नतीजा: मतगणना में कांग्रेस विधायकों के 14 वोट निरस्त कर दिए गए क्योंकि उन्होंने कथित रूप से Returning Officer द्वारा दिए गए पेन के बजाय किसी अन्य पेन से मतदान किया था। बीरेन्द्र सिंह को 40, आर.के. आनंद को 21, और सुभाष चन्द्रा को 15 प्रथम-वरीयता + 14 हस्तांतरित वोट = कुल 29 वोट मिले। सुभाष चन्द्रा 8 वोटों के अंतर से जीत गए!
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुभाष बत्रा ने गंभीर आरोप लगाया: BJP विधायक असीम गोयल ने मतदान कक्ष में रखे वायलेट मार्कर पेन को जानबूझकर नीले पेन से बदल दिया, और बाद में एक निर्दलीय विधायक ने पेन को वापस बदलकर सबूत मिटा दिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट जाने की घोषणा की।
INLD नेता अभय सिंह चौटाला ने सीधे कांग्रेस पर दोष डालते हुए कहा — “कांग्रेस के 14 वोट इसलिए रद्द हुए क्योंकि उन्होंने Returning Officer के पेन के बजाय दूसरे पेन से वोट डाला।” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने INLD के छह विधायकों को क्रॉस वोटिंग के लिए पैसे का प्रस्ताव दिया था।
“वायलेट पेन की जगह नीला पेन रख दिया — 14 वोट निरस्त हो गए — और मीडिया बैरन राज्यसभा पहुँच गया। इसनै लोकतंत्र कहवैं कै पेन-तंत्र?”
— अधि. रविन्द्र सिंह ढुल
🗳️ केस स्टडी II: 2022 हरियाणा राज्यसभा चुनाव — अजय माकन की हार
दलीय गणित: जून 2022 में हरियाणा विधानसभा में BJP के 40, JJP (सहयोगी) के 10, कांग्रेस के 31, INLD का 1, HLP का 1, और 7 निर्दलीय विधायक थे। सीधी जीत के लिए 31 प्रथम-वरीयता वोटों की आवश्यकता थी। BJP के पास अपने एक उम्मीदवार कृष्ण लाल पंवार को जिताने के लिए 40 वोट थे — 9 अतिरिक्त। कांग्रेस के पास ठीक 31 — बिल्कुल थ्रेशहोल्ड पर। पार्टी के उम्मीदवार अजय माकन — पूर्व केन्द्रीय मंत्री — की जीत के लिए हर एक कांग्रेस विधायक का वोट ज़रूरी था।
BJP ने, जबकि उसके पास दूसरी सीट जीतने के लिए कोई वैध गणितीय आधार नहीं था, मीडिया बैरन कार्तिकेय शर्मा (NewsX के मालिक, पूर्व कांग्रेस नेता वेणोद शर्मा के पुत्र, और जेसिका लाल हत्याकांड में दोषी मनु शर्मा के भाई) को ‘निर्दलीय’ उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतारा — सारा दाँव कांग्रेस की पतली-सी बहुमत में सेंध लगाने पर था।
कांग्रेस की सावधानी: पार्टी ने अपने सभी विधायकों को चुनाव से एक सप्ताह पहले रायपुर, छत्तीसगढ़ के एक रिसॉर्ट में ले जाकर “सुरक्षित” किया। लेकिन एक विधायक — आदमपुर से कुलदीप बिश्नोई — वहाँ नहीं गए, CLP बैठक में नहीं आए, और अलग से विधानसभा पहुँचे।
चुनाव का दिन — 10 जून 2022: सुबह 9 बजे मतदान शुरू होते ही कुलदीप बिश्नोई सबसे पहले वोट डालने वालों में से थे — उन्होंने अजय माकन की जगह कार्तिकेय शर्मा को वोट दिया।
इसके बाद BJP और JJP ने शिकायत दायर की कि कांग्रेस की दो विधायक — किरण चौधरी और बी.बी. बत्रा — ने अपने मतपत्र अधिकृत दलीय प्रतिनिधि के अलावा अन्य लोगों को भी दिखाए, जो ओपन बैलट नियमों का उल्लंघन है। Returning Officer ने इन आपत्तियों को दो बार खारिज कर दिया। फिर भी BJP दिल्ली में चुनाव आयोग के पास दौड़ी, और मतगणना — जो शाम 5 बजे होनी थी — रात 1 बजे तक रुकी रही। 8 घंटे से अधिक की देरी!
विनाशकारी परिणाम (11 जून, 2 AM): कृष्ण लाल पंवार — 36 वोट (विजयी)। कार्तिकेय शर्मा — 23 + 6.6 हस्तांतरित = 29.6 वोट (विजयी)। अजय माकन — 29 वोट (पराजित)। कांग्रेस के 31 विधायकों में से 1 ने क्रॉस वोट किया (बिश्नोई), 1 का वोट निरस्त हुआ, 1 निर्दलीय (बलराज कुंडू) ने मतदान नहीं किया। 0.6 वोट के अंतर से माकन हारे!
बाद में क्या हुआ? कुछ ही हफ्तों में कुलदीप बिश्नोई ने कांग्रेस छोड़कर BJP ज्वाइन कर ली। किरण चौधरी भी बाद में BJP में शामिल हो गईं और आज BJP की राज्यसभा सांसद हैं। जून 2025 में, कार्तिकेय शर्मा ने स्वयं एक साक्षात्कार में स्वीकार किया कि उन्हें कांग्रेस विधायकों किरण चौधरी और कुलदीप बिश्नोई के वोटों से भी समर्थन मिला था।
“विधायक को रिसॉर्ट म्हं छिपाया, फेर भी एक भेड़िया भागकै BJP कै गले लग गया। इब बिश्नोई BJP म्हं सै, किरण चौधरी राज्यसभा म्हं — अर माकन साहब हार गए। बता, इसनै लोकतंत्र कहवैं कै बाज़ार?”
— अधि. रविन्द्र सिंह ढुल, जुलाना
🏔️ हिमाचल प्रदेश 2024 — एक और उदाहरण
फरवरी 2024 में हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकार के छह विधायकों ने BJP उम्मीदवार हर्ष महाजन के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की, जिससे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी हार गए। दोनों को 34-34 वोट मिले और लॉटरी से विजेता तय हुआ — BJP के पक्ष में। छह विधायक बाद में वित्त विधेयक पर व्हिप का उल्लंघन करने पर दल-बदल कानून के तहत अयोग्य घोषित किए गए — लेकिन तब तक राज्यसभा सीट BJP की झोली में जा चुकी थी।
🗓️ अबकी बार — 16 मार्च 2026: इतिहास दोहराने की तैयारी
और अब इतिहास एक बार फिर अपने आप को दोहराने की तैयारी कर रहा है। 16 मार्च 2026 को हरियाणा की दो राज्यसभा सीटों पर मतदान होना है — ये सीटें किरण चौधरी और रामचन्द्र जांगड़ा के कार्यकाल की समाप्ति (9 अप्रैल 2026) से रिक्त हो रही हैं।
विडंबना देखिये: किरण चौधरी — जिन्हें 2022 में कांग्रेस से तोड़कर BJP ने राज्यसभा भेजा था, जिन पर अजय माकन की हार का आरोप लगा — आज उनका कार्यकाल समाप्त हो रहा है और BJP ने उन्हें दोबारा टिकट नहीं दिया। इस्तेमाल किया, फिर छोड़ दिया। यही BJP की राजनीति का सच है — “Use and Throw”।
दलीय गणित 2026: हरियाणा विधानसभा में दोनों दलों — BJP और कांग्रेस — को अपना-अपना एक उम्मीदवार जिताने के लिए 31 वोटों की आवश्यकता है। गणित के अनुसार एक सीट BJP की और एक सीट कांग्रेस की झोली में जानी चाहिए। अगर BJP सच में लोकतंत्र का सम्मान करती तो दूसरा उम्मीदवार न उतारती — और चुनाव बिना मतदान के ही तय हो जाता।
लेकिन BJP ने एक बार फिर अपना पुराना खेल दोहराया है। पार्टी ने अपने वरिष्ठ नेता सतीश नांदल — जो पेशे से एक बड़े निर्माण कंपनी (Shivalya Construction Co. Pvt Ltd) के डायरेक्टर और व्यापारी हैं — का पर्चा भरवा दिया है।
असली सवाल: कांग्रेस यदि अपने हिस्से की सीट पर एक दलित वर्ग के जमीन से जुड़े नेता को भेजना चाहती है — जो किसान और मज़दूर वर्ग का प्रतिनिधित्व करे — तो BJP को इसमें क्या आपत्ति है? अगर BJP वाकई किसान-हितैषी और दलित-हितैषी होती तो एक ऐसे नेता को हराने का प्रयास क्यों करती जिसकी जड़ें गाँव की मिट्टी में हैं?
सतीश नांदल की उम्मीदवारी का एकमात्र उद्देश्य है — कांग्रेस विधायकों को तोड़ने की कोशिश करना। अगर नांदल खड़े नहीं होते तो आज ही चुनाव का फैसला हो जाता — दोनों दलों के उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो जाते। लेकिन एक बड़े व्यापारी को मैदान में उतारकर BJP ने धनबल से कांग्रेस तोड़ने की कमान दे दी है।
यह 2016 में सुभाष चन्द्रा (ज़ी ग्रुप), 2022 में कार्तिकेय शर्मा (NewsX), और अब 2026 में सतीश नांदल (निर्माण व्यापारी) — एक ही पैटर्न है: मीडिया बैरन या धन-कुबेर को ‘निर्दलीय’ या दूसरे उम्मीदवार के रूप में उतारो, कांग्रेस विधायकों को पैसे या पद का लालच दो, और जिस सीट पर हक़ नहीं है उसे भी छीन लो।
“किरण चौधरी नै इस्तेमाल करके फेंक दिया, अर इब नांदल नै आगे कर दिया। BJP का मतलब सिर्फ एक सै — ‘इस्तेमाल करो, छोड़ दो, अगला ढूंढो!’ जिब किसान-मज़दूर का बेटा राज्यसभा जावै — तो BJP नै तकलीफ क्यूं होवै सै?”
— अधि. रविन्द्र सिंह ढुल, जुलाना
BJP की रणनीति: एक ही खेल, बार-बार
हरियाणा और अन्य राज्यों के अनुभवों को एक साथ देखें तो BJP की राज्यसभा चुनाव रणनीति एक स्पष्ट पैटर्न दिखाती है:
(i) जब अपने संख्या बल से दूसरी सीट जीतना संभव न हो, तो भी एक BJP-समर्थित ‘निर्दलीय’ उम्मीदवार उतारो — अधिमानतः कोई मीडिया मालिक या धन-कुबेर।
(ii) विपक्षी दलों में असंतुष्ट विधायकों की पहचान करो — व्यक्तिगत लालच, केन्द्रीय एजेंसियों का दबाव, और राजनीतिक पुनर्वास के वादे — इन तीनों हथियारों से उन्हें तोड़ो।
(iii) चुनाव के दिन प्रक्रियागत शिकायतों से मतगणना रुकवाओ, भ्रम और थकान पैदा करो।
(iv) जीत के बाद दावा करो कि विधायक ने “अपनी अंतरात्मा की आवाज़” सुनी।
मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने 2022 में कुलदीप बिश्नोई की क्रॉस वोटिंग पर कहा — “उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनकर वोट डाला। शायद मोदी सरकार की नीतियों और उपलब्धियों से प्रभावित होकर।”
— मनोहर लाल खट्टर, तत्कालीन मुख्यमंत्री हरियाणा
कानूनी विश्लेषण: संवैधानिक शून्य जो हेराफेरी को सक्षम बनाता है
राज्यसभा चुनावों में क्रॉस वोटिंग संकट तीन कानूनी कमजोरियों से उत्पन्न होता है:
पहली: दसवीं अनुसूची का अनुपस्थित होना — जैसा कि कुलदीप नायर (2006) में उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी, दल-बदल विरोधी कानून राज्यसभा चुनावों पर लागू नहीं होता। फलतः कोई भी विधायक बिना किसी दंड के अपने दल के विरुद्ध मतदान कर सकता है।
दूसरी: ओपन बैलट प्रणाली की अपर्याप्तता — 2003 का संशोधन क्रॉस वोटिंग रोकने के लिए लाया गया था, लेकिन व्यवहार में इसे गेम किया जा रहा है। 2016 में पेन-बदल आरोप, 2022 में बैलट-डिस्प्ले आपत्तियों से वैध वोट निरस्त — ओपन बैलट ने विरोधाभासी रूप से हेराफेरी के नए रास्ते खोल दिए हैं।
तीसरी: हॉर्स-ट्रेडिंग के लिए आपराधिक जवाबदेही का अभाव — भारतीय दंड संहिता की धारा 171B (अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 159) चुनाव में रिश्वत को अपराध मानती है, लेकिन राज्यसभा चुनावों में क्रॉस वोटिंग के लिए पैसे लेने वाले विधायकों पर मुकदमे लगभग शून्य हैं।
आवश्यक सुधार: लोकतंत्र की रक्षा के लिए
दसवीं अनुसूची का विस्तार
संसद को संविधान में संशोधन करके राज्यसभा चुनावों को दल-बदल विरोधी कानून के दायरे में लाना चाहिए। दल के आदेश के विरुद्ध मतदान करने वाले विधायक को विधानसभा सदस्यता से अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए।
पार्टी-समर्थित ‘निर्दलीय’ उम्मीदवारों पर रोक
किसी प्रमुख राजनीतिक दल की घोषित सहायता से लड़ने वाले ‘निर्दलीय’ उम्मीदवारों को नियमित या प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। चुनाव आयोग को ऐसे उम्मीदवारों को वास्तविक पार्टी उम्मीदवार मानने का अधिकार दिया जाए।
मतदान प्रक्रिया को टैम्पर-प्रूफ बनाना
2016 का “स्याही कांड” कभी संभव नहीं होना चाहिए था। चुनाव आयोग द्वारा सील किए गए मतदान कक्ष और एक मानकीकृत, अमिट-स्याही पेन — यह अनिवार्य होना चाहिए। पेन बदलने का कोई भी आरोप IPC/BNS के अंतर्गत संज्ञेय अपराध माना जाए।
चुनाव विवादों का त्वरित निपटारा
राज्यसभा चुनावों से उत्पन्न चुनाव याचिकाओं का निर्णय छह माह में होना चाहिए। वर्तमान में 2004 और 2016 की याचिकाएँ दशकों से लंबित हैं — यह न्याय से वंचित करना है।
निष्कर्ष: राज्यसभा की गरिमा बहाल करनी होगी
राज्यसभा की परिकल्पना भारतीय लोकतंत्र में एक संयमित, अनुभवी और संघीय आवाज़ के रूप में की गई थी — न कि मीडिया बैरनों की आर्थिक ताकत या सत्ताधारी दल की चालाकी का मंच। 2016 का स्याही कांड, 2022 में माकन की हार, और अब 2026 में सतीश नांदल को उतारकर कांग्रेस तोड़ने की साजिश — ये अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं, ये एक ही बीमारी के बार-बार लौटने वाले लक्षण हैं।
किरण चौधरी का उदाहरण हर विधायक के लिए सबक है — BJP आपको इस्तेमाल करेगी, राज्यसभा भेजेगी, और फिर कार्यकाल खत्म होते ही छोड़ देगी। 2022 में BJP ने किरण चौधरी को कांग्रेस से तोड़कर राज्यसभा भेजा — और 2026 में उन्हें दोबारा टिकट तक नहीं दिया। यही है BJP का “Use and Throw” मॉडल।
जब कोई पार्टी जिसके पास सीट जीतने के लिए पर्याप्त संख्या बल नहीं है, मनी-पावर, मीडिया और मशीनी राजनीति से क्रॉस वोटिंग करवाती है — तो यह केवल एक चुनाव जीतना नहीं है — यह उन मतदाताओं की इच्छा का अपमान है जिन्होंने उन विधायकों को चुना था, मतदाताओं और प्रतिनिधियों के बीच के संवैधानिक अनुबंध का विश्वासघात है, और संसदीय लोकतंत्र की नींव को भ्रष्ट करना है।
हरियाणा और भारत की जनता बेहतर की हकदार है। अब संसद, चुनाव आयोग और उच्चतम न्यायालय को निर्णायक कदम उठाने का समय आ गया है।